हरिद्वार में एक कथित भाजपा नेत्री से जुड़े व्यभिचार के मामले को लेकर स्थानीय मीडिया की चुप्पी पर जनता में कानाफूसी और सवाल उठ रहे हैं। कई लोगों ने इस विषय पर अपनी चिंता व्यक्त की है और यह सवाल उठाया है कि आखिर क्यों इस प्रकरण को प्रमुख समाचार पत्रों में जगह नहीं मिली, जबकि सामान्य गरीब व्यक्ति से जुड़े मामलों को फोटो सहित प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है।
जनता के बीच यह चर्चा है कि क्या मीडिया को ‘खरीद लिया गया’ या पूर्व में की गई ‘व्यवस्थाओं’ के कारण कलमकारों ने इस मामले में चुप्पी साध रखी है। हरिद्वार में 300 से अधिक कलम के सिपाही होने और प्रेस क्लब की सक्रियता के बावजूद इस मामले में अधिकांश प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों का मौन हैरान करने वाला है।
आम नागरिकों का मानना है कि सत्ता के दबाव में आकर मीडिया ने अपने पाठकों को निराश किया है। यह आशंका भी जताई जा रही है कि राज्य के प्रभारी प्रधान डेस्क देखने वालों ने शायद भेजे गए नाम न छापे हों, जो कि पत्रकारिता के सिद्धांतों के खिलाफ एक गंभीर अपराध है।
लोगों का यह भी कहना है कि यदि कलम इस बार सत्ताधारी दल से जुड़े मामले में खामोश रही है, तो क्या भविष्य में किसी गरीब या असहाय व्यक्ति के प्रकरण में भी ऐसा ही रुख अपनाया जाएगा? यह स्थिति स्वस्थ पत्रकारिता के लिए उचित नहीं मानी जा रही है और मीडिया की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रही है।
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